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Monday, December 6, 2010

Rajendra Prasad

 
* योगेन्द्र प्रसाद 'योगी' के काव्य-संकलन 'प्रेम-पयाम' ( राजकमल प्रकाशन, 1978, © कवि परिवार) से उद्धृत.  गोपालगंज एवं सारण क्षेत्र के इस प्रसिद्ध व्यक्तित्व एवं ख्याति-प्राप्त वकील  का जन्म सिवान जिले के जीरादेई के निकट भटकन ग्राम में 20 जून 1903 ई. में हुआ था. पुण्यतिथि- 24 जनवरी 1994. राजेन्द्र बाबू के ये मित्र थे. कांग्रेस-अध्यक्ष के रूप में अपने गोपालगंज दौरे पर राजेन्द्र बाबू ने इन्ही के घर पर निवास किया था.]
 
देशरत्न

( 1 )
कौन हमारी ज्योति प्रभा को, जग में दिन-दिन फैलाया था ?
कहाँ-कहाँ से तिनके चुन-चुन, फिर किसने नीड़ सजाया था ?
कण-कण का बल सँजो-सँजो कर, बुनियाद नए घर की धर दी ?
वह त्याग तपस्या का जादू, जो दौड़ चला था, किसका था ?
अब काला-काला क्या उठ कर, आज गगन पर छाता है ?
क्या देशरत्न सचमुच हमसे कुछ अब खिंचता-सा जाता है ?
( 2 )
वर्धा-युग की सिद्धि में तो इक वही पुजारी काफी था.
औ’ सरहद के संचालन को हुक्कम गफ्फारी काफी था.
सी. पी. की टेढ़ी उलझन को सरदार सहज समझा लेता.
तकरार बिहारी बंगाली तो, दर पर हल हो सकती थी.
घर की बात घर पर होती, फिर और सहल हो सकती थी.
आदर्श हमारा भूल गया, पग पथ से हटता जाता है
क्या देशरत्न सचमुच हमसे कुछ अब खिंचता-सा जाता है ?
( 3 )
सोने के पिंजरे में चिड़िया, आज़ाद तराना भूल गई.
सर्दूल ने सत्तू को चखकर, अब आग चबाना भूल गई.
अर्जुन ने रण छोड़ दिया, और गांडीव कर से दूर पड़ा है.
कृष्ण-विमुख हो चला किधर, अब कैसा दुर्दिन आन खड़ा है ?
अब कुटियों की है ख़ोज हमें, जो महलों को ठुकराते थे.
दस रुपये को बिक जाते हैं, जो आन पे हम मिट जाते थे.
ओज शिखर से गिरते हमको, वह देख-देख शर्माता है.
क्या देशरत्न सचमुच हमसे कुछ अब खिंचता-सा जाता है ?  ”
( 4 )
जातीयता के नीच झमेलों में रह जाएँ हम ना उलझकर,
काट न डालें जीवन-तरू को, फूँक न डालें अपना घर दर.
फेनल न कूड़ा सूर्य-चाँद पर, सब तेरे ही सर आएगा.
सीख स्वार्थ पर काबू पाना, चेत बिहारी, पछतायेगा.
रूठ नहीं सकता वह हमसे, जो नाज़ हमी पर करता है.
किस ओर बढ़े हम जाते हैं, सोच-सोच शायद डरता है.
फिर बार-बार ‘योगी’ के यह प्रश्न क्यों दिल में आता है.
क्या देशरत्न सचमुच हमसे कुछ अब खिंचता-सा जाता है ?